संस्कारो से ही सधेगा पर्यावरण
संस्कारो से ही सधेगा पर्यावरण आज के भौतिकवाद के दौर में संस्कार विलोपित होते जा रहे है आज के बच्चे,नौजवान और बुजुर्गो के बीच एक लम्बी खाई आ चुकी है। बच्चे बड़ो की बात या तो सुनते नहीं और सुनते है तो अनसुना कर देते है। जहा संस्कार जो पर्यावरण को बचाने की बाते बच्चो को सिखाते थे उनका अब अंत हो चुका है। सनातन संस्कारो में पेड़ो,नदियों ,रास्तो और खेतो की पूजा का रिवाज रहा है। बच्चो को बचपन से पेड़ो की पूजा करना सिखाया जाता था और हर मौके पर जैसे शादी हो ,अमावस्या हो ,पेड़ो की पूजा का विधान है। सारे जहांन में पेड़ काटने से पाप लगता है ऐसा बच्चो को सीखाया जाता रहा है। पेड़ो से सिर्फ सुखी लकड़ियों को काटने का विधान रहा है जिससे चूल्हे जलाये जाते थे लेकिन अब तो जंगल के जंगल काटे जाते है और किसी को कोई दर्द तक नहीं होता है। फलदार पेड़ पोधो को लगाने के रिवाज रहा है जो फल भी दे,ठंडक भी दे और मिटटी को भी पकड़ कर रखे ताकि पर्यावरण को नुकसान नहीं हो। आज पेड़ लगाए भी जाते है तो हाइब्रिड वाले जो न फल देते है न जिनकी जड़ो में मिटटी को पकड़ने ...